Sunday, November 4, 2007

मेरे प्रथम काव्य संग्रह "शब्द यज्ञ" का लोकार्पण समारोह विवरण

स्नेही मित्रों,

दिनांक २६ अक्टूबर २००७ को मेरे प्रथम काव्य संग्रह "शब्द यज्ञ" का लोकार्पण समारोह हिन्दी भवन (महादेवी वर्मा कक्ष) मे सम्पन्न हुआ | माननीय श्री देवेन्द्र दीपक जी (निर्देशक,म.प्र. साहित्य अकादमी) ने समारोह के मुख्य अतिथि होने का एवं माननीय श्री कैलाशचन्द्र पंत जी (महामंत्री, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति) ने समारोह के विशिष्ट अतिथि होने का सम्मान हमे दिया | कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय श्री राजेन्द जोशी (वरिष्ट पत्रकार एवं साहित्यकार) जी द्वारा की गई |
समारोह का संचालन श्रीमति साधना शुक्ला जी(सचिव, प्रखर 'सामाजिक,साहित्यक एवं सांस्कृतिक संस्था')द्वार किया गया साथ ही इस कार्यक्रम को सफल बनाने एवं इस काव्य संग्रह को पाठको समक्ष लाने मे भी श्रीमति साधना शुक्ला जी(सचिव, प्रखर) का अतुलनीय प्रयास रहा |

लोकार्पण समारोह का प्रारंभ दिप प्रज्वलन एवं सरस्वती वन्दना से किया गया तदोपरांत प्रखर संस्था द्वारा साहित्य जगत के अतिवरिष्ठ साहित्यकारों १. श्रीमती निर्मला जोशी २. श्री चन्दप्रकाश जायसवाल ३. श्रीमती शीला टंडन ४. कु. इअनिड जोब ५. श्री महेश सक्सेना ५. श्रीमती प्रमिला नवल का सम्मान श्रीफल एवं शाल द्वारा किया गया एवं इसके बाद मुख्य अतिथियों का भी श्रीफल एवं शाल द्वारा सम्मान किया गया |

"शब्द यज्ञ" का लोकार्पण मुख्य अतिथियों माननीय श्री देवेन्द्र दीपक जी , माननीय श्री कैलाशचन्द्र पंत जी ,माननीय श्री राजेन्द जोशी के द्वारा किया गया एवं एक प्रती मुख्य अतिथियों ने अपने हस्ताक्षर कर मुझे प्रदान की |

"शब्द यज्ञ" काव्य संग्रह की समिक्षा श्री हूकूम सिंह 'विकल' एवं श्रीमति शीला टंडन द्वारा की गई और मेरे इस संग्रह मे क्या अच्छा है और कहां सुधार की आवश्यक्ता है का मार्गदर्शन मुझे प्रदान किया |
श्री 'विकल' जी ने अपने सम्भाषण मे कहा की कवि अपनी भाषा से सम्मोहित करता है और उचित शब्दों का उचित स्थल पर कुशलता के साथ प्रयोग करता है , कवि भविष्य के लिये आशा प्रदान करता है किन्तु संग्रह मे प्रकाशन संबन्धी कुछ त्रुटिया रह गई है जो खटकती है |
श्रीमति शीला टंडन जी ने अपने सम्भाषण मे कहा की कवि मुलत: रहस्यवादी कविता का पोषक है किन्तु प्रेम , समाज की भी चिन्ता करता है और शब्दों की कुशलता से चादर बुनता है | कवि की कविता आपको मन की गहराईयों मे भी ले जाती है किन्तु प्रकाशन संबन्धी कुछ त्रुटिया रह गई है और कवि को क्लिश्ट शब्दों के प्रयोग से भी बचना चाहिये |

समिक्षा के उपरांत कार्यक्रम की संचालक श्रीमति साधना शुक्ला जी द्वार मुझसे काव्य पाठ करने को कहा गया और इस अवसर पर मैने अपनी कुछ कविताये १. शब्द यज्ञ २. थकान लिपि ३. अपशगुन ४. गाथा नई पुरानी ५. मैं कम्बख्त का पाठ किया |

इसके उपरांत मुख्य अतिथियों द्वार सम्भाषण प्रस्तुत किया गया

माननीय श्री कैलाशचन्द्र पंत जी अपने सम्भाषण मे कहते है कवी कि कविताओं को पढने पर पता चलता है की कवि सोच का धनी है और शब्दों के प्रयोग मे कुशल है , और विभिन्न कविताये कवि के संस्कार , समाजिक चिंतन , युवा प्रेम और उद्वेग को दर्शाती है | एक कविता 'दो क्षण' की विवेचना करते हुवे पंत जी कहते है इस कविता का प्रारंभ प्रेमभाव से होता है किन्तु अंत मे प्रेयसि को तुलसी तले दिपक जलाते हुवे प्रेम का विलक्षण विचार कवि के युवा मन के रोपित संस्कार को बताती है |

माननीय श्री देवेन्द्र दीपक जी अपने सम्भाषण स्पष्ट शब्दों मे कहते है की समारोह मे आने के पहले मैने कवि को नही पढा और मैं सोच रहा था की नया कवि , प्रथम संग्रह जाया जाये या नहीं पर यहां आने के बाद और कवि के संग्रह की कुछ कवितायें पढ कर लग रहा है आना व्यर्थ नहीं हुआ |


माननीय श्री राजेन्द जोशी जी अपने सम्भाषण मे कहते है एक अहिन्दीभाषि कवि से इस प्रकार की कविताओं की आशा नहीं थी अत: कुछ त्रुटियों को छोडा जा सकता है | कवि शब्दों का अनुठा प्रयोग करने का साहस रखता है , ये थकान को लिपि की तरहा परिभाषित करता है , कृष्ण को भी याद करता है और तुलसी तले दिप जलाती प्रेयसी की भी कल्पना करता है , चन्दा मामा को हि-मेन के आगे चुका हुवा देखने की पिडा व्यक्त करता है, ग़म को जश्न की तरहा मनात है और रहस्यवाद का भी कविता मे पोषण करता है एवं कुछ प्रयास हिन्दी ग़ज़ल को लेकर भी करता है तो कुल मिलाकर कवि का आने वाल कल उज्वल दिखता है |

एवं अंत मे मेरे पिताजी श्री अरविन्द खोडके जी द्वार आभार प्रकट किया गया तथा मेरे नाना , नानी एवं दादी को मंच पर मुझे आशीर्वाद देने के आमंत्रित किया गया एवं कार्यक्रम की संचालक श्रीमति साधना शुक्ला जी का सम्मान मेरी माताजी श्रीमती किरण खोडके द्वारा किया गया |

समारोह के अंत मे पुस्तक को विक्रय के लिये रखा गया |


स्नेही मित्रों से निवेदन है की यदी वो भी पूस्तक की प्रति चाहते हो तो कृपया ७०/- रुपये (पुस्तक का मुल्य) का डि.डि अथवा मनिआर्डर भेज देवें , पते के लिए मुझे मेल करे, प्रेषण का खर्च मैं स्वयं वहन करुंगा |







धन्यवाद
ऋषिकेश खोडके "रुह"

Wednesday, August 29, 2007

आधारभूत कारण है संवेदक मेरी वेदना

'हिन्द-युग्म' पर 'काव्य-पल्लवन' के अंतरगत प्रकाशित मेरी नयी कविता "आधारभूत कारण है संवेदक मेरी वेदना" को पढ़ने और उस पर अपने विचार और टिप्पणियाँ देने के लिये, कृपया यहाँ पधारें:-
आधारभूत कारण है संवेदक मेरी वेदना

Monday, February 19, 2007

अपनी बात

कोई बेल कैसे विकसित होती है ? उत्तर है बिज से ! तो मेरी काव्य की बेल का बिज कहां से पडा ! अपने अतित मे झांकता हूं तो कुछ धुंधली तस्विरें जहन मे उभरती हैं , पहली अपने नाना की , शायद उनके भजन सुनते- सुनते अचेतन मे कहीं शब्दों का जादू उतर गया, काव्य का बिज सम्भवत वहीं से पडा | दूसरी तस्विर ज्यादा स्पषट है वो है मेरी आई की जो समय के अनुरुप , अवसर विशेष पर त्व्रित कविता करति और बडे चाव से सबको सुनाती और सराहना पाती, ऐसे अनेक अवसरों ने अचेतन मे पडे काव्यबिज की सिंचाई की और मेरे अंतर मे काव्य की बेल विकसित हो गई | मेरी दादी की कहानियां मुझे कविता के प्रारंभिक विषय उपलब्ध कराति रही , पर साहित्य साधना के लिये अत्यंत आव्श्यक अध्ययन सामग्री मेरे लिये मेरे बाबा ने जो स्वयं मराठी साहित्य मे काफी रुची रखते है बडी मात्रा मे उप्लब्ध करवाया , इसके अलावा समय-समय पर मेरे मामा ने जो स्वय अच्छे कवि एवं लेखक भी है मेरा उचित मार्गदर्शन किया और मेरी गलतीयों को सूधारने मे मेरी सहायता की| तो एक प्रकार से सहित्य कि ये बेल पारिवारिक लालन पालन से विकसित हुइ |

प्रारंभिक दौर के बाद एक समय ऐसा आया जब मुझे अपनी लेखन शैली मे बदलाव कि आवश्यकता महसूस हूई और मैने स्वयं की एक वाचन पधति बना कर उसके अनुरुप लिखना प्रारंभ किया और आज मेरी समस्त कविताएँ मेरी इसी शैली मे लिखी हुई हैं |

कालेज के दिनों मे मुझे गजलें सुनने - पढने का चाव हुवा और इस विधा मे भी मेने कुछ प्रयास किये हांलाकी बहर के अक्षान के कारण इसमे त्रुटियां भी है पर फिर भी मैं इस विधा मे कुछ ना कुछ लिखता रहता हूं , हां इस विधा के प्रभाव से मैने उपनाम "रुह्" अवश्य रख लिया

मेरी इस यात्रा मे एक नया मौड आया जब मेरी शादी स्वयं एक कविता से हो गई जो शब्दों से नही नृत्य के द्ववारा काव्य के भावों को प्रकट करती है, इस मौड ने मेरे काव्य मे एक नया आयाम जौड दिया और अब मेरी कविताऔ मे मैं अभिनय के तत्व भी सहजता से सम्मीलित कर पा रहा हूं |

अंत मे अपने पाठकों से मात्र यही निवेदन करना चाहूंगा कि ये विश्वजाल मेरा प्रारंभीक प्रयास है , आपसे मिलने वाला प्रतिसाद मेरे उत्साह मे व्रुद्धि करेगा और अगली बार आप इस बेल को और विकसित पायेंगे एवं मेरे काव्य को नविन रंगो मे रंगा पायेंगे |



ऋषिकेश खोङके " रुह "

राष्ट् की दशा

एक दिन

हमारे एक मित्र

हमारे घर आये,

हमे देखा और फरमाये,

ये क्या हाल बना रखा है !

कुछ लेते क्यो नहीं !


मैने कहा

क्यों क्या हुवा |


वो बोले

क्या हुवा...

अरे ये शरीर है , या शरीर का अवशेष !


मैने कहा

इसमे क्या है विशेष ,

ऐसा तो है सारा देश ,

एक प्रकार से तो मैं देश का नक्शा हूं ,

और स्थिति मे देश से फिर भी अछा हूं |

कभी न कहा था

मैने तो कभी न कहा था,चाहो,
था जो नाता दुर से समिप का,
बस इतना ही चाहा था निभाओ |

तुमने किन्तु रीश्तों की माला तोडी,
एक प्रतिमा प्रेम की सदा को
ह्रदय की निर्जनता मे छोडी |

अब ह्रदय सूना रहेगा सदा,
बस एक नाम तेरा ही हवाओं मे,
यहाँ गुंजता रहेगा यदा-कदा |

मुझको यकीं है

मुझको यकीं है
तुम न लौट कर आओगे |

तुम जो कभी
करीब थे इतने मेरे,
की मेरी सांसे भी रश्क करती थी |

तुम जो कभी
मेरा जीस्म, मेरी रुह थे,
मेरे ख्वाबों की तामिर थे |

तुम जो कभी
"मैं" थे,
मुझको यकीं है
अब न लौट कर आओगे |

पर कहता है
आस का पंछी,
आओगे !

जश्न

रात की देगची मे
आज फिर
मेरा ग़म पकता है|

इस देगची मे
अक्सर मैने
अपना ग़म पकाया है,
आँसुओं से किया है तर
सुखा गला,
जाने कितनी बार
इसी तरह
मन की भूख को मिटाया है |

आज फिर
भूखा है मन,
आज फिर
मेरे पास है पकाने को
बहूत सा ग़म,
रुह की थाली मे है
बहूत सा दर्द,
आँखों की मशकों मे
ढेर सारा पानी है |

रात की देगची मे
आज फिर
मेरा ग़म पकता है |

आज फिर
जश्न होने वाला है |