Monday, February 19, 2007

मुझको यकीं है

मुझको यकीं है
तुम न लौट कर आओगे |

तुम जो कभी
करीब थे इतने मेरे,
की मेरी सांसे भी रश्क करती थी |

तुम जो कभी
मेरा जीस्म, मेरी रुह थे,
मेरे ख्वाबों की तामिर थे |

तुम जो कभी
"मैं" थे,
मुझको यकीं है
अब न लौट कर आओगे |

पर कहता है
आस का पंछी,
आओगे !

जश्न

रात की देगची मे
आज फिर
मेरा ग़म पकता है|

इस देगची मे
अक्सर मैने
अपना ग़म पकाया है,
आँसुओं से किया है तर
सुखा गला,
जाने कितनी बार
इसी तरह
मन की भूख को मिटाया है |

आज फिर
भूखा है मन,
आज फिर
मेरे पास है पकाने को
बहूत सा ग़म,
रुह की थाली मे है
बहूत सा दर्द,
आँखों की मशकों मे
ढेर सारा पानी है |

रात की देगची मे
आज फिर
मेरा ग़म पकता है |

आज फिर
जश्न होने वाला है |

मत पूछो

मत पूछो आँखो मे क्यो नमी सी है |
मत पूछो आवाज क्यो थकी सी है ||
मत पूछो क्यो है उदास चेहरा |
मत पूछो क्यो है रोशनी पे पहरा ||
मत पूछो मुझसे मेरे हालात |
मत पूछो आखीर क्या है बात ||
मत पूछो मैं कुछ बता न पाउंगा |
मत पूछो कहूंगा तो बिखर जाउंगा ||

क्या हो जाता है

जब आओगी तुम,
सोचता हूं तुमसे
ये कहूंगा मैं,
वो कहूंगा |

मगर
क्या हो जाता है ?
कि जब तुम आती हो,
मैं कुछ नही कह पाता |

मैं

हां दरवेश दिवाना हूं मैं |
हां कलंदर मस्ताना हूं मैं ||
हर ग़मो-फिक्र से दुर हूं |
हर रंज से अंजाना हूं मैं ||
शम्अ से दुर रहूं कैसे |
आखिर एक परवाना हूं मैं ||
कर नादानी खुश रहता हूं |
दानाओं से कितना दाना हूं मैं ||
ज़मी-आसमां,जिस्म,"रुह" |
मस्जिदो-बुतखाना हूं मैं ||

मेरा बदन

मेरा बदन,
जैसे मोम |
मेरी रुह,
जैसे बत्ती |
तेरा ख्याल,
जैसे आग |

और मेरी कविता जैसे..
तेरी आग से,
पिघलती मोम,
मेरा बदन |

बहाना

रात छत से अपनी ,
वो पंजो के बल उचका,
चांद को छुने के लिये |

मैं जानता हूं , कि वो..
जानता था यूं कभी चांद
हाथ आया नहीं करता |

और मैं जानता हूं की ये..
चांद छुना एक बहाना था,
वो मौत चाहता था |